स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था
ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था औपनिवेशिक शोषण का शिकार हुई। इसका अर्थ यह है कि ब्रिटिश सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों का चाहे वह प्राथमिक क्षेत्र, द्वितीय क्षेत्र हो या सेवा क्षेत्र हो तीनों क्षेत्रों का लक्ष्यबध्द तरीके से शोषण किया। इन सब के पीछे ब्रिटिश सरकार का एकमात्र यह लक्ष्य था कि अपने आप को किस तरीके से ज्यादा फायदा पहुंचाया जाए। और वे अपने आप को भारतीय अर्थव्यवस्था का शोषण करके लाभ पहुंचाने में सफल भी हुए। भारतीय अर्थव्यवस्था का औपनिवेशिक सरकार द्वारा किए गए शोषण के कारण हालात बहुत ज्यादा लचर हो गए थे। इस अध्याय में आप देखेंगे कि ब्रिटिश सरकार ने किस प्रकार से अपने आप को फायदा पहुंचाने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था का शोषण कैसे किया।
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स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताएं थी:
1. गतिहीन अर्थव्यवस्था: स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरीके से एक गतिहीन अर्थव्यवस्था थी। गतिहीन अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था को कहते हैं जिसमें आय में बहुत कम या कोई भी वृद्धि नहीं होती है। 1860-1945 तक प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर केवल 0.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष तथा 1925-1950 की अवधि तक यह 0.1 प्रतिशत प्रतिवर्ष थी।
2. पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था: स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था पूर्ण रूप से एक हुई अर्थव्यवस्था थी। पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था निम्न प्रति व्यक्ति आय का सूचक होती है अर्थात एक ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें प्रति व्यक्ति आय बहुत ही कम होती है। वर्ष 1947 व 48 में भारत की प्रति व्यक्ति आय मात्र ₹230 थी। ठीक तरीके से भोजन वस्त्र और रहने के लिए घर ना मिलने के कारण जनसंख्या का अधिकतर भाग बहुत गरीब था तथा बेरोजगारी अपने चरम सीमा पर थी।
3. कृषि का पिछड़ापन: देश की लगभग 72% जनसंख्या कृषि कार्यों में लगा हुआ था लेकिन कृषि क्षेत्र का योगदान ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट में केवल 50% था। उत्पादकता बहुत ही कम थी गेहूं का प्रति हेक्टेयर उत्पादन केवल 660 किलोग्राम और चावल का केवल 665 किलोग्राम था।
4. औद्योगिक पिछड़ापन: देश में आधारभूत और भारी उद्योगों की बहुत ही कमी थी। मशीनों का उत्पादन लगभग ना के बराबर था। छोटे पैमाने के उद्योग और कुटीर कुटीर उद्योग लगभग नष्ट हो चुके थे। अपनी पूंजीगत वस्तुओं की आवश्यकता के बड़े भाग के लिए भारतीय उद्योग ब्रिटेन से आयात पर निर्भर हुआ करते थे।
5. अनियंत्रित निर्धनता: भारत की जनसंख्या का एक बड़ा भाग बहुत निर्धन था। लोग एक दिन में दो वक्त का भोजन भी नहीं जुटा पा रहे थे। उनके पास रहने के लिए घर और वस्त्रों की बहुत कमी थी। यह सब व्यापक बेरोजगारी और भारी अशिक्षा के कारण था।
6. आयात पर निर्भरता: देश को मशीनरी और उत्पादन के अन्य उपकरणों के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता था। देश की सेना अधिकांश रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी आयात पर निर्भर थी। इसके अलावा बहुत सारी उपभोक्ता वस्तुएं भी ऐसी थी जिनका आयात विदेशों से किया जाता था जैसे कि सिलाई मशीन दवाइयां मिट्टी का तेल साइकिल इत्यादि।
7. सीमित शहरीकरण: स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की ज्यादातर जनसंख्या गांवों में निवास करती थी। सन 1948 में केवल 14% जनसंख्या शहरों में रहती थी जबकि दूसरी ओर 86% जनसंख्या गांवों में निवास करती थी। ग्रामीण जनसंख्या के लिए कृषि के बाहर अवसरों की कमी थी इससे उनकी निर्धनता और ज्यादा बढ़ गई।
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स्वतंत्रता के समय कृषि क्षेत्र:
1.निम्न उत्पादन एवं उत्पादकता: उत्पादन का अर्थ कुल पैदावार से है जबकि उत्पादन का तात्पर्य प्रति हेक्टेयर भूमि के उत्पादन से है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय दोनों ही चाहे वह उत्पादन हो या उत्पादकता बहुत ही कम थी।
1947 में गेहूं की उत्पादकता 660 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा उत्पादन 64 लाख टन। वहीं दूसरी और चावल की उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 665 किलोग्राम तथा उत्पादन 220 टन थी। वही 2017 व 18 में गेहूं की उत्पादकता 3371 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा उत्पादन 997 लाख टन हो गई तथा चावल की उत्पादकता 2578 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा उत्पादन 1129 लाख टर्न हो गई।
2. निर्वाह खेती का प्रभुत्व: निर्वाह खेती खेती का वह रूप होता है जिसमें फसलों का उत्पादन परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाता है। अर्थात बाजार में बेचने के लिए अधिशेष बहुत ही कम बचता है क्योंकि खेती का रूप ही निर्वाह करना है। ऐसी परिस्थिति इसलिए थी क्योंकि उस वक्त किसानों के अंदर व्यापारिक दृष्टिकोण की कमी थी। परिणाम स्वरूप पिछड़ापन प्रबल हुआ और निर्धनता बहुत ज्यादा किसानों पर हावी हो गई।
3. भूमि के स्वामी तथा उसे जोतने वाले किसानों के बीच खाई: औपनिवेशिक शासन के दौरान कृषि की एक विशेषता यह थी कि भूमि के मालिक तथा भूमि को जोतने वाले किसानों के बीच एक गहरी खाई थी। भूमि के स्वामी फसल के हिस्सेदार तो हुआ करते थे लेकिन फसल की लागत में उनकी ओर से कोई योगदान नहीं होता था। भूमि
के मालिकों का एकमात्र लक्ष्य लगान आय को अधिकतम करना ही था। खेती करने वाले किसानों के पास अंत में सिर्फ इतना ही पारिश्रमिक बच पाता था जिससे कि ये केवल अपने जीवन निर्वाह ही कर सकते थे।
4. छोटी एवं खंडों में बँटी जोतें: खेती के लिए उपलब्ध भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में बटी हुई थी जिसके कारण ज्यादातर जोतें अनआर्थिक रह जाती थी और अगर उन पर खेती किया भी जाता था तो लागत बहुत ज्यादा लगती थी।
5. ब्रिटिश काल के दौरान भू-राजस्व प्रणाली: औपनिवेशिक सरकार ने भारत में भू राजस्व की एक अनूठी प्रणाली को स्थापित कर रखा था। यह प्रणाली किसानों, जमीदारों तथा अंग्रेजी हुकूमत के बीच एक त्रिभुजाकार संबंध को स्थापित करता था। इस प्रणाली को ही भू राजस्व की जमीदारी प्रथा के नाम से जाना गया। इस प्रणाली की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं:
(i) इस प्रणाली के अनुसार जमीदारों को भूमि का स्थाई मालिक माना गया।
(ii) इस प्रणाली के अनुसार जमीदारों को भू राजस्व के रूप में अंग्रेजी हुकूमत को एक निश्चित राशि जमा करानी पड़ती थी।
(iii) इस प्रथा ने जमीदारी को यह स्वतंत्रता प्रदान कर दी थी कि वह भूमि जोतने वाले किसानों से जितनी चाहे राशि वसूल कर सकते थे।
(i) इस प्रणाली के अनुसार जमीदारों को भूमि का स्थाई मालिक माना गया।
(ii) इस प्रणाली के अनुसार जमीदारों को भू राजस्व के रूप में अंग्रेजी हुकूमत को एक निश्चित राशि जमा करानी पड़ती थी।
(iii) इस प्रथा ने जमीदारी को यह स्वतंत्रता प्रदान कर दी थी कि वह भूमि जोतने वाले किसानों से जितनी चाहे राशि वसूल कर सकते थे।
भू राजस्व प्रणाली का किसानों पर प्रभाव:
(i) इस प्रणाली का कृषि तथा किसानों के ऊपर बहुत ही घातक प्रभाव पड़ा।
(ii) इस प्रणाली ने जमीदारों के लिए भूमि को जोतने वाले किसानों के ऊपर असीमित शोषण के सभी रास्ते खोल दिए।
(iii) जमीदारों द्वारा भू राजस्व की दरें बहुत तेजी से बढ़ाई जाने लगी जिसके कारण भूमि जोतने वाले को उसके भूमि से बार-बार बेदखल कर दिया जाता था।
(iv) इस प्रणाली ने किसानों को भूमिहीन श्रमिक बनने पर मजबूर कर दिया था।
(v) भूमिहीन श्रमिकों के रूप में किसानों को अपना जीवन चलाने के लिए मजदूरी बहुत ही मुश्किल से प्राप्त होती थी।
(i) इस प्रणाली का कृषि तथा किसानों के ऊपर बहुत ही घातक प्रभाव पड़ा।
(ii) इस प्रणाली ने जमीदारों के लिए भूमि को जोतने वाले किसानों के ऊपर असीमित शोषण के सभी रास्ते खोल दिए।
(iii) जमीदारों द्वारा भू राजस्व की दरें बहुत तेजी से बढ़ाई जाने लगी जिसके कारण भूमि जोतने वाले को उसके भूमि से बार-बार बेदखल कर दिया जाता था।
(iv) इस प्रणाली ने किसानों को भूमिहीन श्रमिक बनने पर मजबूर कर दिया था।
(v) भूमिहीन श्रमिकों के रूप में किसानों को अपना जीवन चलाने के लिए मजदूरी बहुत ही मुश्किल से प्राप्त होती थी।
6. मानसून पर अधिक निर्भरता: कृषि में बहुत अधिक मात्रा में अनिश्चितता पाई जाती थी क्योंकि कृषि वर्षा पर निर्भर हुआ करती थी अर्थात अच्छी बारिश का अर्थ होता था अच्छा उत्पादन तथा कम वर्षा का अर्थ था बहुत कम उत्पादन ब्रिटिश शासन के दौरान ऐसे कोई भी कदम नहीं उठाए गए जिससे कि कृषि सिंचाई व्यवस्था को अच्छा बनाया जा सके।
7. कृषि का बाध्यकारी व्यापारीकरण: कृषि के व्यापारी करण से अभिप्राय स्वयं उपभोग के लिए खेती के स्थान पर
बाजार में बेचने के लिए खेती करने के उत्पादन से है। भारतीय किसानों को अंग्रेजी हुकूमत ने जीवन निर्वाह फसलों के स्थान पर व्यापारिक फसलों विशेषकर नील की खेती करने के लिए मजबूर किया। क्योंकि ब्रिटेन में कपड़ा उद्योग में कपड़े को रंगने के लिए नील की बहुत मांग थी।
प्राय किसानों को नील की खेती करने के लिए एडवांस में पैसे दे दिए जाते थे जिसके कारण भारतीय किसानों को विवश होकर नील की खेती करनी पड़ती थी तथा बाजार की अनिश्चितताओं का भी सामना करना पड़ता था
ब्रिटिश काल से पूर्व कृषि की अवस्था: ब्रिटिश राज के दौरान कृषि की पिछड़ी अवस्था गति हीनता से पूर्व कृषि की अवस्था बिल्कुल विपरीत थी।
भारत में औपनिवेशिक राज्य से पहले ग्रामीण भारत का वर्णन एक ऐसी प्रणाली के रूप में किया जाता है जिसमें ग्रामीण समुदाय आत्मनिर्भर हुआ करते थे इन ग्रामीण समुदायों में किसान तथा कार्यकर्ता दोनों सम्मिलित होते थे|
ब्रिटिश राज से पहले भारतीय किसानों का काम फैसले उगाना तथा पशु पालन करना था जबकि कार्यकर्ताओं का काम आवश्यक सेवाएं जैसे लोहार सोनार धोबी मोची आदि प्रदान करना था।
राज्य तथा किसानों के बीच कोई मध्यस्थ नहीं हुआ करते थे किसान सीधे राजा को भू-राजस्व दिया करते थे| ग्रामीण भारत के जीवन की मुख्य विशेषता समृद्धि तथा स्थिरता हुआ करती थी।
प्राय किसानों को नील की खेती करने के लिए एडवांस में पैसे दे दिए जाते थे जिसके कारण भारतीय किसानों को विवश होकर नील की खेती करनी पड़ती थी तथा बाजार की अनिश्चितताओं का भी सामना करना पड़ता था
ब्रिटिश काल से पूर्व कृषि की अवस्था: ब्रिटिश राज के दौरान कृषि की पिछड़ी अवस्था गति हीनता से पूर्व कृषि की अवस्था बिल्कुल विपरीत थी।
भारत में औपनिवेशिक राज्य से पहले ग्रामीण भारत का वर्णन एक ऐसी प्रणाली के रूप में किया जाता है जिसमें ग्रामीण समुदाय आत्मनिर्भर हुआ करते थे इन ग्रामीण समुदायों में किसान तथा कार्यकर्ता दोनों सम्मिलित होते थे|
ब्रिटिश राज से पहले भारतीय किसानों का काम फैसले उगाना तथा पशु पालन करना था जबकि कार्यकर्ताओं का काम आवश्यक सेवाएं जैसे लोहार सोनार धोबी मोची आदि प्रदान करना था।
राज्य तथा किसानों के बीच कोई मध्यस्थ नहीं हुआ करते थे किसान सीधे राजा को भू-राजस्व दिया करते थे| ग्रामीण भारत के जीवन की मुख्य विशेषता समृद्धि तथा स्थिरता हुआ करती थी।
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में अकाल: अकाल का अर्थ होता है फसलों का नष्ट होना एवं सरकार की गलत नीतियों के कारण अनाजों का अभाव एवं व्यापक रूप से भूखमरी का फैल जाना। पूरे
औपनिवेशिक शासन काल के दौरान अधिकांश भारतीय भुखमरी के कगार पर रहत1760 से लेकर 1943 तक भारत में समय-समय पर नियमित आधार पर बहुत ही भयंकर रूप से अकाल पडते रहे। इन सभी अकालों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण 1969-70 में बंगाल का अकाल था जिसमें लाखों की संख्या में लोग मारे गए थे! औपनिवेशिक काल के दौरान लगभग 8.5 करोड़ लोगों की अकाल के कारण मृत्यु हुई थी।
इसके विपरीत स्वतंत्रता के बाद अकाल से किसी व्यक्ति की मृत्यु नहीं हुई है।
औपनिवेशिक शासन काल के दौरान अधिकांश भारतीय भुखमरी के कगार पर रहत1760 से लेकर 1943 तक भारत में समय-समय पर नियमित आधार पर बहुत ही भयंकर रूप से अकाल पडते रहे। इन सभी अकालों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण 1969-70 में बंगाल का अकाल था जिसमें लाखों की संख्या में लोग मारे गए थे! औपनिवेशिक काल के दौरान लगभग 8.5 करोड़ लोगों की अकाल के कारण मृत्यु हुई थी।
इसके विपरीत स्वतंत्रता के बाद अकाल से किसी व्यक्ति की मृत्यु नहीं हुई है।
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स्वतंत्रता के समय भारतीय औद्योगिक क्षेत्र: ब्रिटिश शासन काल में भारतीय औद्योगिक क्षेत्र का बहुत ही व्यवस्थित ढंग से पतन हुआ। इसमें दो बहुत ही महत्वपूर्ण बातें निहित हैं|औपनिवेशिक सरकार की विभेदमूलक नीतियों के कारण विश्व भर में प्रसिद्ध भारतीय हस्तशिल्प उद्योग का पतन निवेश के भारी अभाव के कारण आधुनिक उद्योग का निराशाजनक विकास
1.हस्तशिल्प का पतन: ब्रिटिश शासन से पहले भारतीय हस्तशिल्प उद्योग अपने उत्कृष्टता एवं गुणवत्ता के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध था लेकिन ब्रिटिश शासन के कारण इस उद्योग का धीरे-धीरे पतन हो गया ऐसा ब्रिटिश सरकार के द्वारा अपनाई जाने वाली विभेदमुलक आर्थिक एवं राजनैतिक नीतियों के कारण हुआ। इस संदर्भ में निम्नलिखित बिंदु ध्यान देने योग्य हैं:
A. राजदरबार ओं का विलुप्त होना: ब्रिटिश शासन से पहले देश के अलग-अलग भागों में नवाबों राजाओं तथा सम्राटों का शासन हुआ करता था वे भारतीय हस्तशिल्प को संरक्षण प्रदान किया करते थे जिसके कारण भारतीय हस्तशिल्प उद्योग को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई थी लेकिन ब्रिटिश शासन का आरंभ देसी राज दरबारो का अंत साबित हुआ जिसके परिणामस्वरूप भारतीय हस्तशिल्प का पतन भी शुरू हो गया
B. राज्य की विभेद मुल्क प्रशुल्क नीति: ब्रिटेन ने भारत को अपने निरंतर बढ़ रहे उद्योगों के लिए एक कच्चे माल का बहुत ही उत्कृष्ट साधन और साथ ही अपनी औद्योगिक वस्तुओं की बिक्री के लिए एक उत्तम बाजार पाया। इसके लिए ब्रिटेन ने एक विभेदमूलक प्रशुल्क नीति अपनाई तथा लागू भी किया।
इस नीति के अनुसार बिना किसी निर्यात शुल्क के भारत से कच्चे माल का निर्यात किया जाता था तथा बिना किसी आयात शुल्क के ब्रिटेन के उद्योगों में तैयार हुए उत्पादों का भारत में आयात किया जाता था
इस नीति के अनुसार बिना किसी निर्यात शुल्क के भारत से कच्चे माल का निर्यात किया जाता था तथा बिना किसी आयात शुल्क के ब्रिटेन के उद्योगों में तैयार हुए उत्पादों का भारत में आयात किया जाता था
C. मशीनों द्वारा निर्मित वस्तुओं से प्रतियोगिता: मशीनों द्वारा निर्मित ब्रिटेन की वस्तुओं के उत्पादन लागत बहुत कम होती थी तथा भारत में बनी हस्तशिल्प की वस्तुएं उनके मुकाबले महंगी हुआ करती थी जिसके कारण भारतीय वस्तुएं उनके सामने टिक नहीं सकी इसके अतिरिक्त मशीनों द्वारा निर्मित वस्तुओं की गुणवत्ता भारतीय वस्तुओं की तुलना में अधिक हुआ करती थी इसी प्रतियोगिता के कारण भारतीय शिलपियों को अपना व्यवसाय हमेशा के लिए मजबूर होकर बंद करना पड़ा।
D. मांग का एक नया स्वरूप: ब्रिटिश लोग अपने साथ अपनी संस्कृति भी भारत लेकर आए जिसको देखा देखी भारत में एक नए वर्ग का जन्म हुआ। यह उभरा हुआ नया वर्ग पश्चिमी जीवन शैली को अपनाने में बहुत रुचि लेने लगा जिसके कारण बाजार में मांग का एक नया स्वरूप सामने आया। जिसका प्रभाव ब्रिटिश वस्तुओं के पक्ष में था तथा भारतीय वस्तुओं के विपक्ष में। इस प्रक्रिया के कारण भी भारतीय उद्योग धीरे-धीरे नष्ट होते गए।
E. भारत में रेलवे का आगमन: भारत में रेलवे प्रणाली के शुरू होने के कारण कम लागत वाली ब्रिटेन में बनी वस्तुओं के बाजार का आकार बढ़ने लगा तथा उच्च लागत वाली भारतीय वस्तुओं का बाजार सिकुड़ने लगा इसने भारतीय हस्तशिल्प के पतन की प्रक्रिया को और ज्यादा तीव्रता प्रदान की।
भारतीय उद्योगों का निराशाजनक विकास:
ब्रिटिश शासनकाल के दौरान भारत में आधुनिक उद्योग का विकास बहुत ही निराशाजनक था 19वीं शताब्दी के दूसरे भाग में ही आधुनिक उद्योगों का उत्थान शुरू हुआ|
निजी उद्यमियों द्वारा कुछ उद्योगों को स्थापित किया गया इसमें लोहा एवं इस्पात के उद्गम चीनी सीमेंट तथा कागज बनाने की मिले शामिल थी। टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी की स्थापना 1960 में हुई थी।
पूंजीगत वस्तुओं का उद्योग लगभग ना के बराबर था
आधुनिक उद्योगों का निराशाजनक विकास यह केवल रेलवे के विस्तार तक ही सीमित था इससे ब्रिटिश उत्पादों के लिए भारतीय बाजार का विस्तार करने में सहायता मिली थी
निजी उद्यमियों द्वारा कुछ उद्योगों को स्थापित किया गया इसमें लोहा एवं इस्पात के उद्गम चीनी सीमेंट तथा कागज बनाने की मिले शामिल थी। टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी की स्थापना 1960 में हुई थी।
पूंजीगत वस्तुओं का उद्योग लगभग ना के बराबर था
आधुनिक उद्योगों का निराशाजनक विकास यह केवल रेलवे के विस्तार तक ही सीमित था इससे ब्रिटिश उत्पादों के लिए भारतीय बाजार का विस्तार करने में सहायता मिली थी
Ø स्वतंत्रता के समय विदेशी व्यापार: प्राचीन काल से ही भारत एक महत्वपूर्ण व्यापारिक देश रहा है लेकिन अंग्रेजी सरकार द्वारा वस्तु उत्पादन तथा व्यापार की अवरोधक नीतियों तथा करो ने भारत के विदेशी व्यापार की मात्रा, घटक तथा ढांचे को बुरी तरह प्रभावित किया था स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के विदेशी व्यापार की अवस्था कुछ इस प्रकार की थी:
1. कच्चे माल का शुद्ध निर्यातक तथा तैयार माल का आयातक: भारत प्राथमिक उत्पादों जैसे कि सिल्क कपास ऑन चीनी नील जूट इत्यादि का एक निर्यातक बन गया था तथा अंतिम वस्तुओं का आयातक बन गया था जो कि पूर्ण रूप से ब्रिटेन के उद्योगों में तैयार हुई वस्तुएं थी।
2. विदेशी व्यापार पर ब्रिटेन का एक अधिकारी नियंत्रण: सन 1869 में स्वेज नहर के खुलने से भारत तथा ब्रिटेन के बीच गतिशील जहाजों के लिए प्रत्यक्ष पद मिल गया इस नहर ने भूमध्य सागर को सूरज नगर की खाड़ी से जोड़ दिया। इससे परिवहन की लागतो में भारी कमी आई। अब भारतीय बाजारों का शोषण और अधिक आसान हो गया भारत के 50% से अधिक निर्यात तथा आया तब केवल भारत तथा ब्रिटेन के बीच सीमित हो गया। जबकि भारत से निर्यात इस प्राथमिक उत्पाद ब्रिटिश उद्योगों के आगत बन गए। तथा ब्रिटेन में तैयार की गई अंतिम वस्तुओं की बिक्री के लिए भारत एक विशाल बाजार बन गया।
3. व्यापार में आधिक्य लेकिन केवल अंग्रेजों के लाभ के लिए: यह बहुत आश्चर्य की बात है कि ब्रिटिश शासन के दौरान हमारे निर्यात हमारे हाथों से कहीं अधिक थे इसका आशय व्यापार शेष के अधिक से हैं। लेकिन यह व्यापार शेष का आदि के केवल और केवल प्राथमिक वस्तुओं का था ना कि औद्योगिक वस्तुओं का। इन प्राथमिक वस्तुओं का प्रयोग करके पुनः भारतीय बाजारों में तैयार वस्तु के रूप में इन्हें बेचा जाता था जिससे अंग्रेजों को दोगुना मुनाफा तथा भारतीयों को नुकसान का सामना करना पड़ता था।
4. भारतीय संपत्ति का निष्कासन: भारत में अपने आप निवेशक शासन को भली-भांति चलाने के लिए ब्रिटिश सरकार को अधिक मात्रा में प्रशासनिक खर्च करने पड़ते थे जिसकी भरपाई वह यहीं से किया करते थे। ब्रिटिश हुकूमत को अपनी साम्राज्यवादी नीति को सफल बनाने के लिए भी कई युद्धों को लड़ना पड़ता था उसमें होने वाले खर्च को भी भारतीय लोगों की जेबों से वसूला जाता था।
Ø ब्रिटिश शासन के दौरान जनांकिकीय रूपरेखा: ब्रिटिश शासनकाल के दौरान जनसांख्यिकी अवस्थाएं उन सभी विशेषताओं को बताती हैं जो एक गति ही तथा पिछड़ी अर्थव्यवस्था में देखी जा सकती हैं। इसके अंतर्गत जन्म दर मृत्यु दर शिशु मृत्यु दर जीवन प्रत्याशा इत्यादि को शामिल किया जाता है।
1.
जन्म दर तथा मृत्यु दर: ऊंची जन्म दर तथा मृत्यु दर को देश के पिछड़ेपन का सूचक माना जाता है। ब्रिटिश शासन के दौरान यह दोनों ही बहुत ज्यादा थी। जन्म तथा मृत्यु दर 48 तथा 40 प्रति हजार थे। जो कि एक व्यापक निर्धनता की अवस्था को दर्शाते हैं।
2.
2.शिशु मृत्यु दर: शिशु मृत्यु दर (1 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों की मृत्यु दर) बहुत ऊंची थी यह लगभग 218 प्रति हजार थी। वर्तमान में यह 34 प्रति हजार है।
3.
जीवन प्रत्याशा: ऑस्टन जीवन प्रत्याशा केवल 32 वर्ष होती थी जबकि वर्तमान में बढ़कर यह 68 वर्ष हो गई है। जीवन प्रत्याशा का कम होना इस बात का संकेत था की स्वास्थ्य संबंधी सुधार, जागरूकता का अभाव व गरीबी बहुत ज्यादा थी।
4.
साक्षरता दर: साक्षरता दर केवल 16% थी इसके अंतर्गत वो लोग हैं जो सिर्फ लिख सकते हैं और पढ़ सकते हैं। साक्षरता दर का कम होना आर्थिक पिछड़ेपन की निशानी मानी जाती है दूसरी ओर महिलाओं का साक्षरता दर और भी दुखद था यह केवल 7% था जो कि समाज में पाए जाने वाले लिंगभेद का सूचक है।
Ø
स्वतंत्रता के समय व्यावसायिक ढांचा: व्यावसायिक ढांचे से अभिप्राय कार्यशील जनसंख्या का अर्थव्यवस्था के प्राथमिक द्वितीयक तथा तृतीय क्षेत्रों में वितरण से है
- कृषि क्षेत्र का प्रभुत्व: कृषि क्षेत्रों में लगभग 72.7% कार्य शक्ति जुटी हुई थी। जबकि दूसरी ओर विश्व के विकसित देशों में जनसंख्या का बहुत कम प्रतिशत कृषि पर आश्रित है उदाहरण के लिए इंग्लैंड तथा अमेरिका की जनसंख्या का 2% जापान का 12% तथा जर्मनी का 4% कृषि पर आश्रित है।
- असंतुलित विकास: विकास को संतुलित तब कहा जाता है जब अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों का समान रूप से विकास हो जबकि भारत में द्वितीय तथा तृतीय क्षेत्रों का विकास अपने प्रारंभिक चरण में था अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था स्वतंत्रता के समय एक तरफा थी तथा पिछड़ी हुई थी
- उद्योग व्यवसाय का एक महत वहीं स्रोत: स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की जनसंख्या का केवल 9% भाग निर्माण उद्योग खनन इत्यादि में लगा हुआ था इसके विपरीत हम अगर दूसरे देशों की बात करें जैसे कि अमेरिका में 32% इंग्लैंड में 42% तथा जापान में 39% जनसंख्या इन क्रियाओं में लगी हुई है।
Ø स्वतंत्रता के समय आधारभूत ढांचा: इसके अंतर्गत व उद्योग शामिल होते हैं जो अन्य उद्योगों के विकास में सहायता करते हैं उदाहरण के लिए परिवहन बिजली संचार बैंकिंग इत्यादि अंग्रेजी शासनकाल में कुछ आधारभूत उद्योग जैसे रेलवे जल परिवहन बंदरगाह डाक एवं टेलीग्राम आदि के रूप में विकसित हुए जबकि इस विकास के पीछे वास्तविक कारण अंग्रेजी हुकूमत के हितों को पूरा करना ही था।
1.
रेलवे: भारत में रेलवे की शुरुआत 1850 में हुई तथा भारतीय रेलवे ने अपना कार्य 1853 से स्टार्ट किया यह अंग्रेजी शासकों का भारत के लिए महत्वपूर्ण योगदान भी साबित हुआ रेलवे के आगमन से अब लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर आना जाना आसान और सस्ता हो गया इसने भौगोलिक तथा सांस्कृतिक बाधाओं को समाप्त कर दिया तथा इससे राष्ट्रीय एकता को बल मिला रेलवे का विकास ब्रिटेन की तैयार वस्तुओं को ऑफ निवेशक भारत के आंतरिक भागों में पहुंचाने के लिए किया गया इसका उद्देश्य भारत में ब्रिटिश उत्पादों के लिए बाजार के आकार को विस्तृत करना इसने भारतीय कृषि के व्यवसायीकरण को बढ़ावा दिया
2.
सड़के: सड़कों का निर्माण प्राथमिक रूप से फौज के आवागमन तथा कच्चे माल को नजदीकी रेलवे स्टेशन अथवा बंदरगाह पर भेजने के लिए हुआ ताकि इसे आसानी से ब्रिटेन ले जाया जा सके इसके कारण ग्रामीण लोगों को प्राकृतिक आपदाओं अकाल आदि का सामना करना पड़ा।
3.
जल परिवहन तथा वायु परिवहन: अंग्रेजों ने जल तथा वायु परिवहन को विकसित करने के लिए विभिन्न प्रयास किए इनका विकास पपर्याप्ति से बहुत दूर था भारतीय जहाजी कंपनियों को विदेशी कंपनियों से कड़ी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता था उनके विकास के पीछे मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों के औपनिवेशिक हितों को पूरा करना था।
4.
संचार: आधुनिक डाक प्रणाली का आरंभ 1837 में हुआ दूरसंचार को भारत में प्रस्तुत किया गया पहली तार लाइन 1857 में खोली गई।
Ø
ब्रिटिश शासन के भारत में कुछ सकारात्मक प्रभाव:
1.रोजगार के नए अवसर: रेलवे तथा सड़कों के विस्तार ने आर्थिक तथा सामाजिक विकास के कई नए अवसर खोल दिए
2.अकाल पर नियंत्रण: यातायात के साधन के विस्तार से सूखाग्रस्त क्षेत्रों को शीघ्रता से अब खाद्य सामग्री पहुंचाई जाने लगी परिणामस्वरूप अकाल नियंत्रित हो गए।
3.कुशल प्रशासनिक प्रणाली: भारत को ब्रिटिश सरकार की एक महत्वपूर्ण दिन कुशल प्रशासनिक प्रणाली था इसने हमारे राजनीतिज्ञों तथा नियोजकों के लिए आगे का काम आसान कर दिया।
4.किसानों का व्यापारिक दृष्टिकोण: ब्रिटिश शासन काल के अंतर्गत कृषि के बाध्यकारी व्यापारी करने निर्वाह किसानों को बाजार की अनिश्चितताओं से अवगत कराया यह बात बिल्कुल सच है लेकिन इससे किसानों के दृष्टिकोण में धीरे-धीरे बदलाव भी आया।
2.अकाल पर नियंत्रण: यातायात के साधन के विस्तार से सूखाग्रस्त क्षेत्रों को शीघ्रता से अब खाद्य सामग्री पहुंचाई जाने लगी परिणामस्वरूप अकाल नियंत्रित हो गए।
3.कुशल प्रशासनिक प्रणाली: भारत को ब्रिटिश सरकार की एक महत्वपूर्ण दिन कुशल प्रशासनिक प्रणाली था इसने हमारे राजनीतिज्ञों तथा नियोजकों के लिए आगे का काम आसान कर दिया।
4.किसानों का व्यापारिक दृष्टिकोण: ब्रिटिश शासन काल के अंतर्गत कृषि के बाध्यकारी व्यापारी करने निर्वाह किसानों को बाजार की अनिश्चितताओं से अवगत कराया यह बात बिल्कुल सच है लेकिन इससे किसानों के दृष्टिकोण में धीरे-धीरे बदलाव भी आया।
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